कुछ अधूरा सा...!!!
जब कुछ नहीं था
तब तुम दिखी थी मुझे
हाथ फैलाये
मेरा इंतज़ार कर रही थी..
तुम चाहती थी
कि मैं तुमसे दोस्ती करूँ
तुम्हें ठीक तरह समझू
तुम्हारी गहराइयों में झांकू
और धीरे धीरे तुममें समां पाऊं..
तुम मुझे अपना बनाना चाहती थी
पर तेज़ी से नहीं वक़्त के साथ
तुम मेरी गलतियों पर
माफ़ी भी देना चाहती थी
तुम मेरे आसूंओं को
पोछ्ना भी चाहती थी
तुम मेरे गिरने पर
मुझे संभालना भी चाहती थी
तुम मेरे अकेलेपन को
बांटना भी चाहती थी
और
तुम मेरे संग बन्ज़ारो की तरह
भटकना भी चाहती थी..
पर यह सब अधूरा ही रह गया
क्यूँकि ना तुम कभी कह पायी
और ना ही मैं कभी वहां रुक पाया...!!!
Best poem
ReplyDelete👏👏 woww❤
ReplyDeleteBeautiful😍✨
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